यह सर्वसम्मत विषय है कि देश या समाज की सेवाभावी संस्थाओं के विशाल आयोजित अधिवेशन उसकी सजीवता और कार्य तत्परता के परिचायक होते हैं। श्री भारतवर्षीय दिगम्बर जैन (धर्म संरक्षिणी) महासभा वर्तमान प्रचलित सभी जैन संस्थाओं जो महासभा का ही अंग थीं एवं पूर्व में जुड़ी हुई थीं, में सर्वाधिक प्राचीनतम संस्था है, जो अपने गौरवपूर्ण जीवन काल के 115 वर्ष व्यतीत कर शताब्दी वर्ष मना चुकी है। इतनी लम्बी अवधि में इस संस्था ने समाज में विभिन्न उतार-चढ़ाव देखे हैं। अनेकों सामाजिक, धार्मिक और राजनैतिक संघर्षों में इसने अपना सर्वस्व लगाकर सफलता ही नहीं प्राप्त की है वरन् जैन धर्म की भारी प्रभावना की है। महासभा अपने आप में एक ऐतिहासिक दस्तावेज है। सन् 1941 के श्रवणबेलगोल में महामस्तकाभिषेक के अवसर पर महासभा का भव्य अधिवेशन हुआ था जिसमें भूतपूर्व अध्यक्ष सर सेठ श्री हुकुमचंद जी साहेब ने सर सेठ भागचंद जी सोनी साहेब को महासभा की बागडोर संभलाई थी उसके बाद महासभा की बागडोर रायबहादुर सेठ राजकुमार सिंह जी, सेठ भंवरीलाल जी बाकलीवाल, राय साहब चांदमल जी पाण्ड्या, सेठ लिखमीचंद जी छाबड़ा आदि के नेतृत्व में महासभा ने समाज की जो अमूल्य सेवायें की हैं वे समाज के इतिहास में चिरस्मरणीय रहेंगी। वर्तमान समय में श्रावक शिरोमणि, दानवीर, तीर्थभक्त, कर्मठ मुनिभक्त, समर्पित समाज रत्न श्री निर्मल कुमार जैन सेठी की अध्यक्षता में प्रांतीय अध्यक्ष, महामंत्रियों एवं क्षेत्रीय शाखाओं के सक्रिय सहयोग से यह संस्था धर्म एवं समाज के हितों की रक्षा के लिए निरन्तर प्रगति के पथ पर अग्रसर है। |